एक खोज
हनुमान के बहाने, अपनी ओर एक यात्रा।
एक सवाल, एक दावा नहीं
हनुमान जी कौन हैं? यह सवाल पूछते ही मन में एक छवि उठती है। गदा, उड़ता पर्वत, प्रभु राम के चरणों में झुका एक भक्त। यह छवि सच है, और पूज्य है। इसे यहीं, अपनी जगह, पूरे आदर के साथ रहने दो।
पर एक पुरानी परंपरा रही है, रामायण को सिर्फ बाहर की घटना की तरह नहीं, भीतर के एक नक्शे की तरह भी पढ़ने की। अध्यात्म रामायण और संतों की वाणी में लंका को अहंकार, सीता माता को बंदी आत्मा, और प्रभु राम को परम तत्व की तरह देखा गया है। हम उसी परंपरा में खड़े होकर एक खोज पर निकलेंगे। न किसी का खंडन, न किसी का उल्लंघन। यह भक्ति का विकल्प नहीं, उसके साथ एक दर्पण है। बस हनुमान जी की यात्रा के साथ साथ चलेंगे, और देखेंगे कि वह हमें क्या दिखाती है।
इस सवाल का जवाब अभी नहीं देंगे। इसे अपने साथ चलने देना। यात्रा के अंत तक, हो सकता है जवाब किसी और जगह से आए, जहाँ तुमने देखा ही न हो।
युग, समय नहीं, एक अवस्था
हम सोचते हैं सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग बीते हुए समय के पड़ाव हैं। पर ये भीतर की अवस्थाएँ भी हैं। मनुष्य अपनी प्रकृति के हिसाब से इन सब युगों को रोज़ जीता है। जब मन अंधकार में है, प्रतिक्रिया में है, खुद से कटा हुआ है, वह उसका कलियुग है। और जैसे जैसे उसकी प्रकृति निखरती है, सत की ओर बढ़ती है, वैसे वैसे उसका युग स्वयं में बदलता जाता है।
चारों जुग परताप तुम्हारा।
चारों युगों में तुम्हारा प्रताप है, यानी वह शक्ति जो हर अंधकार में मौजूद है।
कहा जाता है हनुमान जी कलियुग में भी जीवित हैं। तो सवाल और गहरा हो जाता है। इस कलियुग जैसे मन में, जो आज जीवित है, जो रोज़ लड़ रहा है, वह कौन है? और वह कौन सी शक्ति है जो उसे इस अंधकार से बाहर ला सकती है? चलो, हनुमान जी की यात्रा में इसी को ढूँढते हैं।
भूली हुई शक्ति
एक कथा है। हनुमान जी बचपन में बहुत चंचल थे, और उन्हें एक श्राप मिला कि वे अपनी शक्ति भूल जाएँगे। जब तक कोई याद न दिलाए, उन्हें अपना बल याद ही नहीं रहेगा। शक्ति गई नहीं, बस परदे के पीछे चली गई।
अब इसे अपने ऊपर रखकर देखो। एक बच्चा जन्म लेता है, अपनी पूर्णता में, बिना किसी छवि के। फिर माँ बाप, जो उसके पहले गुरु हैं, उसे एक जगत देते हैं। एक नाम, एक पहचान, सही और गलत का एक नक्शा, दुनिया को देखने का एक चश्मा। यह ज़रूरी भी है, इसके बिना वह दुनिया में चल नहीं पाता। पर इसी जगत में घूमते घूमते, वह धीरे धीरे स्वयं को भूल जाता है। वह बाहर से जुड़ता जाता है, और भीतर से कटता जाता है। उसे लगने लगता है कि वह बस यही है, यही नाम, यही डर, यही सीमाएँ।
यही हनुमान जी का श्राप है, हम सबके भीतर। शक्ति का होना और शक्ति का याद होना, दो अलग बातें हैं। हमारे भीतर भी सब है। बस याद नहीं। और जब तक याद नहीं, तब तक यह कलियुग का मन ही चलता रहता है।
जामवंत, वह आवाज़ जो याद दिलाती है
समुद्र के किनारे, जब सारी वानर सेना हताश बैठी है, जामवंत हनुमान जी के पास जाते हैं और उन्हें उनकी शक्ति याद दिलाते हैं। तुम कौन हो, तुम क्या कर सकते हो, यह तुम भूल कैसे गए। और याद आते ही हनुमान जी का रूप बढ़ने लगता है।
जीवन में यही पल सबसे कीमती है। किसी भी उम्र में, किसी भी मोड़ पर, कोई जामवंत आता है। कभी वह एक गुरु होता है, कभी एक किताब, कभी एक वाक्य, कभी सिर्फ एक चुप पल जिसमें भीतर से कुछ कहता है, "तुम इतने ही नहीं हो।" यह स्वयं से जुड़ने का बीज है। और बस यह बीज मिलते ही, खोज शुरू हो जाती है। तब समझ आता है, कुछ है जो मुझे पाना है। मेरी शक्ति कुछ और है, मेरा घर कहीं और है।
जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।
चालीसा हनुमान जी को गुरु की तरह भी पुकारती है। वह जामवंत, वह गुरु तत्व, हमें भीतर से जगाने वाली शक्ति का ही नाम है।
समुद्र, यानी मन को पार करना
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं, जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं।
प्रभु राम की मुद्रिका मुख में रखकर वे समुद्र लाँघ गए। सत्य को साथ रखकर ही यह समुद्र पार होता है, अकेले बल से नहीं।
यह समुद्र कोई पानी का समुद्र नहीं। यह मन है। विचारों का, स्मृतियों का, भय का, इच्छाओं का अथाह समुद्र। इस पर तीन बाधाएँ आती हैं, और तीनों भीतर की हैं।
पहली, मैनाक पर्वत। समुद्र के बीच एक पर्वत उठता है और कहता है, थोड़ा विश्राम कर लो, थक गए होगे। यह वह आराम है, वह सुविधा है, जो यात्रा को रोक देती है। हनुमान जी उसे प्रणाम करते हैं, छूते हैं, पर रुकते नहीं। रास्ते में जो सुख ठहरा देना चाहे, उसका आदर करो, पर उसमें बैठ मत जाओ।
दूसरी, सुरसा। एक राक्षसी जो अपना मुँह बड़ा करती जाती है। हनुमान जितना अपना रूप बढ़ाते हैं, वह उतना ही बड़ा होती जाती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे जैसे तुम अपनी समस्याओं को बड़ा करते हो, उन्हें जीतने के लिए तुम्हें भी बड़ा होना पड़ता है, और लड़ाई कभी खत्म ही नहीं होती। पर हनुमान जी यहाँ एक उल्टा काम करते हैं। वे अचानक बहुत छोटे हो जाते हैं, सुरसा के मुँह से निकलकर बाहर आ जाते हैं, और प्रणाम करते हैं। यह पहला बड़ा संकेत है। कुछ बाधाएँ बल से नहीं, अपने को छोटा करके पार होती हैं।
तीसरी, सिंहिका। वह राक्षसी जो परछाईं पकड़कर खींच लेती है। यह वह शक्ति है जो तुम्हें तुम्हारी ही छाया से, तुम्हारे ही भ्रम से पकड़ लेती है। इसे पहचानना और काटना पड़ता है, वरना यह बीच राह में डुबो देती है।
पहले छोटे, फिर भीतर
भीतर का द्वार इतना सूक्ष्म है कि वहाँ अकड़ नहीं, सिर्फ झुकना जाता है।
लंका के द्वार पर लंकिनी खड़ी है, नगरी की रक्षक। हनुमान जी उसे विनम्रता से, पर दृढ़ता से, पार करते हैं। और फिर लंका में प्रवेश कैसे करते हैं? विशाल रूप में नहीं, लगभग एक मच्छर के आकार में। ध्यान दो इस क्रम पर, पहले वे छोटे होते हैं, फिर भीतर जाते हैं। जब तक मेरा अहंकार भरा हुआ है, मैं भीतर जा ही नहीं सकता। पहले हमें छोटा होना पड़ता है, अपने को गलाना पड़ता है, तभी भीतर की वह गली खुलती है जहाँ आत्मा बैठी है।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रूप धरि लंक जरावा।
आत्मा को पाने के लिए सूक्ष्म, छोटा रूप। झूठे जगत को जलाने के लिए विकराल रूप। क्रम उलटा मत करना।
आत्मा की ओर, सीता की खोज
उस छोटे, विनम्र रूप में, हनुमान जी को सीता माता मिलती हैं। बंदी, घिरी हुई, फिर भी अपने सत्य में अडिग। भीतर पढ़ो तो सीता माता आत्मा हैं। वह आत्मा जो अहंकार के नगर में बंदी पड़ी है, चारों ओर रावण की शक्तियाँ, यानी हमारी वृत्तियाँ। आत्मा कहीं गई नहीं, बस घिरी हुई है, हमारी ही प्रतीक्षा में।
जैसे जैसे हनुमान जी भीतर बढ़ते हैं, वैसे वैसे हम भी अपने आत्म की ओर बढ़ते हैं। पहली बार यह एहसास कि भीतर कुछ है जो शुद्ध है, जो छूटना चाहता है। हनुमान जी प्रभु राम की मुद्रिका सीता माता को देते हैं, और सीता माता प्रमाण के रूप में अपनी चूड़ामणि देती हैं। यह आत्मा और साधक के बीच का पहला सच्चा संवाद है, एक पहचान, एक भरोसा।
पर ध्यान देना, अभी आत्मा बंदी ही है। पहचान हुई है, मुक्ति नहीं। साधक ने आत्मा को देख लिया, पर अहंकार का नगर अभी खड़ा है।
झूठे जगत का दहन
हनुमान जी की पूँछ में आग लगाई जाती है, और वे पूरी लंका जला देते हैं। यह आग विनाश की नहीं, शुद्धि की है। यह उस झूठे जगत को जलाना है जो माँ बाप ने, समाज ने, आदतों ने हमारे चारों ओर खड़ा कर दिया था। साधना का यह वह चरण है जहाँ साधक अपनी मेहनत से, अपने पुरुषार्थ से, झूठी मान्यताओं को, बाहरी ढाँचों को जलाने लगता है।
पर यहाँ एक गहरी बात है। हनुमान जी ने लंका जलाई, पर रावण को नहीं मारा। नगर जला, पर अहंकार का राजा अब भी सिंहासन पर बैठा है। यानी तुम अपनी मेहनत से बाहरी झूठ जला सकते हो, आदतें बदल सकते हो। पर अहंकार की जड़, वह "मैं" जो सबके बीच बैठा है, वह इस तरह नहीं मरता। और वह काम हनुमान जी का नहीं है।
साक्षी, जब "मैं" मिटता है
अहंकार, अहंकार को नहीं मार सकता।
रावण कौन है? वह अहंकार है, वह "मैं" जो हर चीज़ को जीतना चाहता है। उसके दस सिर हमारी ही दस वृत्तियाँ हैं। अब सोचो, इस अहंकार को मारेगा कौन? अगर "मैं" अपने अहंकार को मारने निकलूँ, तो मारने वाला भी तो "मैं" ही है। जो खुद को मिटाने का प्रयास करता है, वह प्रयास भी उसी का खेल है।
इसीलिए रावण का अंत हनुमान जी के हाथों नहीं होता। वह काम प्रभु राम का है, परमात्मा का है। हनुमान जी वहाँ सेवक हैं, साक्षी हैं। वे लड़ते हैं, सेवा करते हैं, पूरी शक्ति लगाते हैं, पर अंतिम प्रहार, अहंकार की मृत्यु, वह प्रभु राम करते हैं, और हनुमान जी बस देखते हैं।
इसे रोज़ के जीवन में पकड़ो। कभी गुस्से में रहे हो, और भीतर कोई चुपचाप तुम्हें गुस्सा करते हुए देख भी रहा हो? वह देखने वाला कभी गुस्सा नहीं होता, बस देखता है। वही साक्षी है। एक पड़ाव आता है जब समझ आता है कि मैं तो असल में केवल वही साक्षी हूँ। और गहरे जाओ तो पता चलता है, यह जो "मैं" इतनी देर से कर रहा था, यह "मैं" तो है ही नहीं।
पर ध्यान देना, यह "मैं" का मिटना किसी शून्य में खो जाना नहीं है। यह दास का समर्पण है। हनुमान जी प्रभु राम में विलीन होना नहीं माँगते, वे सेवक ही बने रहना चाहते हैं। उनका "मैं" मिटता है तो इस भाव में, मैं कुछ नहीं, तुम सब कुछ। यहाँ अहंकार तो चला जाता है, पर प्रेम और सेवा रह जाती है। साक्षी होना सूना होना नहीं, प्रेम से भरा होना है।
और जिस क्षण यह "मैं" गिरता है, उसी क्षण अहंकार भी गिरता है। तुम्हें उसे मारना नहीं पड़ता। प्रभु राम स्वयं रावण का दहन करते हैं। आत्मा और परमात्मा का मेल किसी के करने से नहीं होता, वह स्वयं होता है। दो "मैं" थे, एक जो करता था, और एक जो बस देखता था। जिस दिन आत्म मिलता है, उस दिन पता चलता है, मैं वह करने वाला कभी था ही नहीं। मैं तो हमेशा से वही देखने वाला था।
भीतर के पात्र
बाहर की कथा के सब पात्र, भीतर के पात्र बन जाते हैं।
यह नक्शा नहीं, एक नाटक है। आत्मा (सीता माता) अहंकार की दीवार (रावण) में बंदी है, चारों ओर वृत्तियाँ। विवेक (विभीषण) उसी नगर में बैठा, पर सत्य की ओर पाला बदल लेता है। और प्राण (हनुमान जी) वह सेतु है जो परमात्मा (प्रभु राम) तक जोड़ता है। दीवार तुम्हारे प्रयास से नहीं, प्रभु राम से गिरती है। तब सीता माता प्रभु राम से मिलती है। आत्म और परमात्म, एक।
और तब सीता माता प्रभु राम से मिलती हैं, आत्मा परमात्मा से। इसीलिए हम सीताराम कहते हैं, उल्टा नहीं। आत्मा पहले, फिर परमात्मा, क्योंकि अपनी आत्मा को पहचाने बिना परम तक पहुँचा नहीं जाता। और जब दोनों मिलते हैं, तो वे दो नहीं रहते।
तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै।
साधना से प्रभु राम मिलते हैं, और जन्मों के दुख भूल जाते हैं।
इस पूरी कथा के पात्र अब भीतर के पात्र बन जाते हैं। रावण, अहंकार। विभीषण, विवेक, वह भीतरी आवाज़ जो सत्य जानती है और अंत में सत्य की ओर चली जाती है। चालीसा इसे सीधे कहती है, "तुम्हरो मंत्र विभीषन माना," और "कुमति निवार सुमति के संगी," तुम कुबुद्धि हटाते हो, सुबुद्धि के साथी हो।
और इन सबके बीच हनुमान जी, वह सेतु, वह प्राण। ध्यान दो, हनुमान जी पवनपुत्र हैं, वायु के पुत्र, यानी श्वास के, प्राण के। और प्राण ही वह पुल है जो देह को आत्मा से, साधक को सत्य से जोड़ता है। चालीसा कहती है, "राम दुआरे तुम रखवारे।" भीतर का वह द्वार, जहाँ से परम तक पहुँचा जाता है, उसका रखवाला यही प्राण शक्ति है।
शिव का अंश, पंच तत्व
कहा जाता है हनुमान जी शिव के अंश हैं, रुद्र अवतार। और शिव, एक तरह से, संपूर्ण प्रकृति हैं। उनमें पंच तत्व समाए हैं, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। और यह शरीर भी इन्हीं पंच तत्वों से बना है।
वही शक्ति, वही प्रकृति, जिसका एक रूप हनुमान जी हैं, उसी का कच्चा माल हमारे भीतर भी बह रहा है। यह कोई दावा नहीं, एक भाव है। एक याद कि जिस शक्ति को हम बाहर खोजते हैं, उसका स्रोत हमसे दूर नहीं है।
तो कलियुग के हनुमान कौन?
मैं ही हनुमान हूँ।
बाहर, वे प्रभु राम के परम भक्त हैं, चिरंजीवी हैं, पूज्य हैं, और रहेंगे। पर भीतर, इस कलियुग जैसे मन में, जो भूल चुका है पर याद कर सकता है, जो छोटा होकर भीतर जा सकता है, जो साक्षी बनकर देख सकता है, वह कौन है? वह तुम हो।
पर सावधान, यह अकड़ नहीं, सबसे बड़ी विनम्रता है। हनुमान जी की पूरी शक्ति उनके दास भाव में है। "मैं ही हनुमान हूँ" का मतलब यह नहीं कि मैं महान हूँ। इसका मतलब है, मेरे भीतर वह भूली हुई शक्ति है जो मुझे मेरी आत्मा तक ले जा सकती है। और वहाँ पहुँचकर पाऊँगा कि असली काम मैंने किया ही नहीं। मैंने सिर्फ यात्रा की, छोटा हुआ, खोजा, और साक्षी बनकर देखा, जैसे प्रभु राम ने स्वयं रावण को मिटाया।
हनुमान जी सबसे बड़े होकर भी सबसे छोटे रहे। सबसे शक्तिशाली होकर भी सिर्फ सेवक रहे। किसी और के आने की प्रतीक्षा मत करो। वह जामवंत भी तुम्हारे भीतर है, वह हनुमान जी भी, वह सीता माता भी, और वह प्रभु राम भी।
अपनी भूली हुई शक्ति को याद कर लेना, और अंत में साक्षी होकर अपने ही भीतर वह मिलन देख लेना, यही है आरोहण।